वास्तु पर विश्वास न करने वाले अधिकतर लोग इसे अंध विश्वास के रूप में देखते हैं इस विषय में मैं ये समाधान करना चाहूंगी कि वास्तु शास्त्र पूरी तरह विज्ञानं सम्मत है.भारत और विदेशों में भी अनेकों प्रयोगों के द्वारा यह प्रमाणित हो चूका है क़ि वास्तु शास्त्र के नियम विज्ञानं के नियमों की ही भांति सार्वभोमिक हैं .sarvbhoamikta का अर्थ है किसी भी चीज का हर परिस्थिति में लागु होना जैसे क़ि पानी को अगर आग पर रखा जाएगा तो वह गरम अवश्य होगा चाहे उस समय हम सुखी हों ,उदास या परेशां हों ,पहली मंजिल पर हों या दसवीं पर हों ,चीन में हों या जापान में हों. उसी प्रकार वास्तु के निर्देशों का पालन करने से वे अवश्य ही हमें लाभ पहुंचाते हैं चाहे हम किसी भी जगह पर हों या किसी भी मन: स्थिति में हों..मेरा कहने का मतलब केवल इतना है क़ि अगर आप याकोई भी वास्तु को केवल इसलिए नहीं अपना रहा है क्योंकि वह इसे विज्ञानं-सम्मत नहीं मानता तो शायद वह गलत है कम से कम मेuहिसाब से किसी चीज का परीक्षण किए बिना उस पर निर्णय देना उचित नहीं लगता
मेरे बारे में

- pratibha mishra 8574825702
- my name is pratibha,it means inteligence.I believe that one should be hard working.by hard work you can get inteligence and success.
बुधवार, 29 सितंबर 2010
शनिवार, 25 सितंबर 2010
वास्तु की उपादेयता
वास्तु की हमारे जीवन में क्या आवश्यकता है ,कुछ लोगों ने मुझसे बात कर ये प्रश्न किया तो मेरे मन में आया क़ि शायद ये प्रश्न कुछ अन्य लोगों के मन में भी आता हो जब मैं आप लोगों से वास्तु के बारे में जानकारी देने का वादा कर चुकी हूँ तो आप लोगों के मन में भी कभी न कभी ये बात जरुर आयी होगी....तो इसका जवाब ये है क़ि हम कोई भी कर्म क्यों करते हैं ? जीवन में कुछ बेहतर पाने के लिए ही न ,तो वास्तु को भी हमें इसी लिए अपने जीवन में अपना लेना चाहिए क्यों क़ि अंगरेजी दवाओं की तरह वास्तु के कोई साइड इफेक्ट नहीं हैं वास्तु को जी वन में अपनाने से या तो आपको फायदा होगा या पहले की तरह सब कुछ रहेगा किसी भी तरह का नुकसान होने का दर नहीं है. जैसे क़ि मैं पहले भी लिख चुकी हूँ मनुष्य के पास तीन तरह का भाग्य होता है जन्म से, कर्म से और धरती से प्राप्त, तो वासु द्वारा हम धरती से प्राप्त भाग्य को जगा सकते हैं बढा सकते हैं ये पूरी तरह विज्ञानं सम्मत है ...अगली बार वास्तु के विज्ञानं सम्मत होने पर चर्चा करेंगे.
बुधवार, 22 सितंबर 2010
hamari sahcharee prakriti
वैसे तो सहचरी शब्द का प्रयोग साथी के लिए किया जाता है लेकिन स्त्री हो यापुरुष सभी के जीवन में प्रकृति सहचरी केरूप में हमेशा साथ रहती है . जन्म लेने से लेकर मृत्यु तक मानव किसी न किसी रूप में प्रकृति पर आश्रित रहता है,इस बात का अनुभव मुझे परसों ही एक बार फिर हुआ जब मेरी मित्र अलका जी ने कुछ घरेलु उपचार बता कर मुझे अपच के कारण हो रहे पेट दर्द से मुक्ति दिला दी ईश्वर ने हमारे शरीर को इस प्रकार से बनाया है कि यदि हम धीरज से काम लें तो शरीर स्वयम ही अपना उपचार कर लेता है अधिकतर छोटी मोटी बीमारियों का उपचार उपवास द्वारा या ढेर सारा गर्म पानी पी कर किया जा सकता है ,अधिक जल्दी में होने पर जैसे कि आजकल सभी के पास समय का आभाव रहता है हमें जडी बूटियों , घरेलु नुस्खों आदि का ही उपयोग करने का प्रयास करना चाहिए अन्यथा दीर्घ काल में रासायनिक तत्व युक्त दवाएं हमारे शरीर को नुकसान ही पहुंचाएंगी एक बार फिर मेरे साथ प्रकृति को नमस्कार कीजिये क्योंकि प्रकृति हमारी मां भी है सहचरी भी और मार्ग दर्शक भी.
मंगलवार, 14 सितंबर 2010
हिंदी दिवस और हम
आज हिंदी दिवस है ,सभी को शुभकामनाएँ .हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाये जाने की मांग सबसे पहलेकिसी हिन्दी भाषी ने नहीं बल्कि एक गुजराती कवी ने की थी ये हमारे देश की एकता का सबसे बड़ा उदाहरण है .हम सब के लिए ये गर्व का विषय है कि जब पुरे देश में किसी एक भाषा को चुने जाने की बात आती है तो पुरे देश से हिन्दी को ही समर्थन मिलता है. राष्ट्र भाषा से आगे बढ़ते हुए आज हिन्दी अंतर्राष्ट्रीय भाषा बनने कीओर अग्रसर है.ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी हिन्दी के कई शब्दों को अपने कोष में शामिल कर चुकी है. हम सभी ब्लॉगर भी अपनी भाषा को नए आयाम देने में और समृद्ध करने में लगे हैं.चलते चलते भारतेंदु जी की इन पंक्तियों कोयाद कर लेते हैं "निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल " सच है अपनी भाषा में ज्ञान-विज्ञानं होने से पूरेदेश की उन्नति आसवानी से हो सकती है.
शनिवार, 4 सितंबर 2010
महिला सशक्तिकरण.
महिला सशक्तिकरण की चर्चा सुनायी पड़ती रहती है आज समाचार पत्रों में महिलाओं के साथ किए गए दुर्व्यवहार के बारे में एक नहीं बल्कि कई ख़बरें पढ़ीं पढ़ कर मन बड़ा खट्टा सा हो गया.हमारे देश में प्राचीन काल से ही महिलाओं के प्रति सम्मान प्रदर्शित किया जाता रहा है कभी "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते .....अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है वहां देवता बसते हैं " यह कहकर समाज को प्रलोभित किया गया कि भैया मान जाओ स्त्रियों का सम्मान करो तो तुम्हारे घर भुत प्रेत और राक्षस आदि नहीं आयेंगे बल्कि भगवान आयेंगे,सत्पुरुष आयेंगे कभी नवरात्र में कन्या पूजन का नियम बना कर समाज और पुरुष को स्त्री जाती के आगे झुकने के लिए एक प्रकार से देखा जाये तो विवश किया गया ये सारे नियम बनाने वाले स्त्री-उत्थान के लिए प्रयास करने वाले अधिकतर पुरुष ही थे लेकिन ये समाज और पुरुष न तो उस प्राचीन समय में बदला और न ही आज बदलने को तैयार है जब देश के अधिकांश बड़े पदों की शोभा महिलाएं ही बाधा रही हैं .मेरा मानना है इस परिस्थिति के लिए स्त्रियाँ भी किसी हद तक दोषी हैं .क्या ये सिर्फ मेरी ही सोच है या आप लोगों को भी ऐसा लगता है मैं इस बारे में आप लोगों के विचार जानने के लिए बहुत उत्सुक हूँ कुछ आप की सुनना चाहती और भीर कुछ अपनी भी कहना चाहती हूँ .अगर आप के दिल में भी इस विषय को लेकर कुछ सवाल हैं या कुछ जवाब हैं तो हमारी आपकी जरुर जमेगी नमस्कार फिर मिलते हैं.
गुरुवार, 2 सितंबर 2010
वास्तु और पर्व
किसी भी धर्म का पर्व हो उसमें सफाई का विशेष महत्त्व होता हैं चाहे वह नहा धो कर नए कपडे पहनने की बात हो या घर को साफ सुथरा कर के रंग रोगन करवाने की, ले दे कर बात स्वछता की ही होती है . वास्तु शास्त्र में भी सफाई को बहुत महत्त्व दिया गया है वास्तु के अनुसार हमें अपने निवास को नियमित रूप से साफ करना चाहिए और कबाड़ को अवश्य ही हटाते रहना चाहिए.बहुत से लोगों के मन में ये सवाल उठता है क़ि घर में रहने वाली हर चीज कभी न कभी अवश्य प्रयोग में आ जाती है ,तोफिर वह फालतू या कबाड़ कैसे हो सकती है,इस हेतु मैं कहना चाहूंगी क़ि घर में रहने वाली वह वस्तु जिसके बिना भी काम चल सकता है या जो पिछले तीन सालों से प्रयोग में नहीं लाई गयी हैं वह कबाड़ की ही श्रेणी में आती है ऐसी वस्तुएं आपका विकास रोकती हैं.ऐसी चीजों के एकत्रित होनें का प्रमुख कारण है मनुष्य कीसंग्रह करने की प्रवृत्ति .हमारे आपके साथ होता ये है क़ि एक मेज पर चाय पीते पीते बोर होगये तो दूसरी मेज ले आये लेकिन पहली मेज को हटाया नहीं बल्कि उसे बरामदे में या छत पर रख दिया,नया सोफा आ गया तो पुराने को लिविंग रूम या लाबी में रख दिया इस तरह करते-करते हमारे पास बहुत सा अतिरिक्त सामान इकठ्ठा हो जाता है जो हमें सुविधा देने की जगह हमारे लिए मुसीबत बन जाता है,व्यर्थ में ही हम अपने घर में एक वास्तु दोष पैदा कर लेते हैं .तो दोस्तों इस बार पड़ने वाले त्यौहार पर अपने आप से वादा कीजिये क़ि बेकार के मोह को त्याग कर हर फालतू चीज को अपने घर से अपनी जिन्दगी से निकाल बाहर करेंगे मैं विश्वास दिलाती हूँ क़ि आप अपने भीतर तुरंत ही एक नयी ऊर्जा अनुभव करेंगे और बिगड़े काम बनने लगेंगे सो अलग. अच्छा अब विदा ; और हाँ नकारात्मकता फ़ैलाने वाली इन चीजों को अपने घर से हटाने के बाद सूचित जरुर कीजियेगा क़ि आप कैसा मासुस कर रहे हैं सकारात्मकता या POSITIVITY
बुधवार, 1 सितंबर 2010
सत्यम शिवम् सुन्दरम
नमस्कार आप लोगों द्वारा किए गए उत्साह वर्धन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ,जैसा कि आप लोग चाहते हैं कि वास्तु के सम्बन्ध में और अधिक जानकारी ब्लॉग पर देती रहूँ ,यही मेरी भी इच्छा है और मैं इस हेतु अपना प्रयास करती रहूंगी.मैं लखनऊ की रहने वाली हूँ गंगा जमुनी संस्कृति यानी कि हिन्दू मुस्लिम सभ्यता का मिश्रण यहाँ के लोगों के खून में मानो शामिल है ,यहाँ एक शब्द बोला जाता है इंशाअल्लाह ऐसा ही होगा अर्थात भगवान ने चाहा तोऐसा ही होगा यहाँ मैं यही शब्द प्रयोग करना चाहूंगी रमजान का महीना समाप्त होने को हैदुसरी ओर नवरात्र भी आरहे हैं ऐसे में सभी लोगों में साफ सफाई और उत्साह का माहौल होना लाजमी है साफ सफाई को वास्तु में भी बहुत महत्त्व दिया गया है जैसा कि सभी जानते हैं सत्यम शिवम् सुन्दरम हमारी संस्कृति का सूत्र वाक्य है कृपया इसे धर्मं से न जोड़ें.;;;;तो मैं कहना ये चाहती हूँ कि साफ सफाई का सम्बन्ध केवल त्याहारों से ही नहीं बल्कि हमारे जीवन की खुशहाली से भी है हमारे जीवन के छोटे बड़े कामों के बनाने या बिगड़ने से भी है इस बारे में आगे विस्तार से चर्चा करूंगी;;;;.
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