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my name is pratibha,it means inteligence.I believe that one should be hard working.by hard work you can get inteligence and success.

शनिवार, 21 मई 2011

samaj me mahilaon ka sthan





              बहुधा हम देखते हैं कि किसी महिला का समाज में परिचय देते समय यह भी उल्लेख किया जाता है कि वह कामकाजी है या घरेलू.घरेलू महिला का अर्थ होता है जो घर में रह कर पति और बच्चों की देखभाल करे और कामकाजी महिला वह है जो घर से बाहर भी कुछ निश्चित घंटे कार्य करती है.बाहर निकल कर काम करने वाली या फिर कहा जाये कामकाजी महिलाओं को समाज में कुछ अधिक आदर से देखा जाता है ,और  घरेलू मानी जाने वाली महिलाओं के मन में कहीं न कहीं इस बात के प्रति रोष भी होता है. यहाँ स्वाभाविक रूप से एक प्रश्न उठता है कि क्या घरेलू महिला कामकाजी नहीं होती है?
            
                   घर में रहने वाली महिलाओं के लिए माना जाता है कि उनके पास काफी समय होता है  घर का काम कुछ ही घंटों में  समाप्त कर शेष समय में वे आराम कर सकती हैं या अपना  मनोरंजन कर सकती हैं ,लेकिन व्यवहारिक रूप से ऐसा संभव नहीं हो पाता है.घर पर रहने वाली महिलाओं  से परिवारीजनों की कुछ अधिक ही अपेक्षाएं रहती हैं ,चाहे वह पति और बच्चे हो या फिर अन्य ससुरालीजन हों.परिवार के सभी सदस्यों की यही सोच होती है कि सारा दिन घर पर रह कर क्या हमारे लिए कुछ भी समय नहीं निकाला जा सकता .लेकिन नौकरी करने वाली महिलाओं को एक निश्चित समय पर घर से निकलना होता है ,इसलिए घर के सदस्य ही नहीं बल्कि नौकर भी उनके समय अनुसार काम करने का प्रयास करते हैं .मेलजोल वाले अन्य लोग  तथा  पड़ोसी भी किसी अवसर पर उनकी गैरमौजूदगी का बुरा नहीं मानते ,इस तरह की कुछ सहूलियतें मिल जाने से वे अपने समय का बेहतर उपयोग कर पाती हैं
                 अधिकतर गृहणियों पर बच्चों की देखभाल और उनकी पढाई का ,घर की पूरी व्यवस्था संभालने का तथा माता पिता की चिकित्सा तथा देखभाल का इतना अधिक भार हो जाता है कि उन्हें अपनी मुलभुत दैनिक जरूरतों के लिए भी पर्याप्त अवकाश नहीं मिल पाता है   समाज के बहुत से घरों में ये देखा जा सकता है कि एक गृहणी के पास छोटे बड़े कामों का इतना अधिक बोझ हो जाता है कि पूरा दिन भी उसके लिए कम पड़ जाता है .घर के सभी सदस्य अपने अपने कार्यों में व्यस्त रहते हैं और गृहणी अपनी पीड़ा या अकेलापन किसी के साथ बाँट भी नहीं पाती है..घर वालों के उदासीन और उपेक्षापूर्ण रवैये के कारण ऐसे में कभी कभी महिलाऐं अवसाद और चिडचिडेपन का शिकार भी हो जाती हैं.समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर तथा एक एन.जी.ओ. की प्रबंधक कमलजीत कौर का मानना है कि घर पर रहने वाली महिलाऐं सप्ताह के सातों दिन और दिन के चौबीसों घंटे कार्य करती हैं और किसी भी मायने में बाहर निकलने वाली महिलाओं से कम मेहनत नहीं करतीं.
                             घर से बाहर निकल कर काम करने वाली महिलाओं पर भी कुछ कम दबाव नहीं होता .जहाँ घरेलू महिलाऐं अपने तरीके से घर को चला कर तथा पल पल बढ़ते अप्ने बच्चों को देख कर संतोष और सूख अनुभव कर सकती वहीं कामकाजी महिलाऐं छह कर भी ऐसा नहीं कर पाती हैं.अपने कार्यस्थल पर संतोषजनक नतीजे देने के साथ ही उसे पारिवारिक जिम्मेदारियों को भी बेहतर तरीके से निभाना होता है .एक औरत के मन में स्वाभाविक रूप से अपने परिवार के प्रति प्रेम और जिम्मेदारी की भावना होती है लेकिन समाज और परिवार दोनों ही बाहर निकल कर काम करने वाली कामकाजी महिलाओं को उतना जिम्मेदार नहीं समझते. अपनी ममता और कर्तव्य भावना को समाज के सामने प्रमाणित करने के लिए उसे अपनी पूरी शक्ति झोंक देनी पड़ती है साथ ही महिलाओं के वेतन का उपयोग करते हुए परिवार यह जतानानहीं भूलता कि ये सब वे अपनी खुशी और आजादी के लिए कर रही हैं और इसके साथ उन्हें अपनी घरेलू जिम्मेदारियां निभानी ही हैं..अधिक तनाव और श्रम के कारण कभी कभी अनेक प्रकार की शारीरिक और मानसिक परेशानियाँ भी  उन्हें घेर लेती हैं .
               घर पर रहने वाली महिलाऐं हों या बाहर काम करने वाली दोनों को ही अपने अपने तरीके से  पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन करना होता है .जहाँ घरेलू महिला अपने श्रम द्वारा परिवारीजनों को सुख देती है और उनकी उन्नति में योगदान देती है वहीं कामकाजी महिला आर्थिक सहयोग दे कर पारिवारिक उन्नति में अपना योगदान देती है .समाज के चहुंमुखी विकास के लिए दोनों का ही अपना अलग महत्त्व है.माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी पिछले दिनों एक वक्तव्य में घरेलू महिलाओं कोभी  कामगार मान कर मासिक वेतन दिए जाने की वकालत की है ,अन्य किसी के समझने से पहले स्वयं घरेलू महिलाओं को कामकाजी महिलाओं का और कामकाजी महिलाओं को घरेलू महिलाओं का आदर करना सीखना होगा.
                           
            समाज में स्त्री को यथोचित स्थान  दिलाने के लिए स्वयं महिलाओं को  ऐसी बातों पर ध्यान देना होगा और वस्तुस्थिति को समझने का प्रयास करना होगा .गोस्वामी जी ने मानस में एक स्थान पर लिखा है "नारि न मोहे नारि के रूपा "अर्थात कोई स्त्री कितनी भी सुन्दर क्यों न हो दूसरी स्त्री कभी उसके रूप पर मोहित नहीं होती है या फिर कहा जा सकता है कि एक नारी के गुणों या क्षमता की  दूसरी नारी प्रशंसा नहीं कर सकती.सदियों से परवश अथवा पराधीन होने के कारण अथवा कमोबेश अन्य कारणों से  स्त्रियों के भीतर स्वयं को श्रेष्ठ प्रमाणित करने की भावना विकसित हो चुकी है और इसी भावना ने स्वयं नारी जाति का भारी नुकसान किया है .अपनी इस कमी को पहचान कर उससे निज़ात पाना  एक सही कदम होगा

1 टिप्पणी:

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

आपने एक अच्छी बात बतायी है, अब पूरी कब तक होती है?